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हनुमान समुद्र पार करते हैं — लंका की ओर छलांग
हनुमान की समुद्र पार महाछलांग की कथा — सुरसा की परीक्षा, छाया राक्षसी, और सीता खोज का पहला चरण।

जब कोई अन्य वानर सागर पार न कर सका, हनुमान अपनी पूर्ण शक्ति में उठे। यह कथा रामायण में साहस की धड़कन है।
दक्षिण तट पर वानर गर्जते सागर के सामने खड़े थे। पार लंका थी, और उसकी दीवारों में कहीं सीता प्रतीक्षा कर रही थीं — जनकपुत्री, राम-पत्नी, रावण के गर्व में बंदी। अंगद, नील और अन्य अपनी शक्ति नापकर अधूरी पाए। दूरी केवल जल नहीं थी; संशय थी। तब जामवंत ने हनुमान की ओर देखा, जो ऐसे शांत बैठे थे मानो उनकी महिमा सोई हो।
अपना स्वरूप स्मरण
जामवंत ने हनुमान के जन्म, वायु के वर, बाल लीलाओं, और इस वरदान की बात कही कि राम-कार्य हेतु आवश्यकता पर शक्ति जागेगी। शब्दों के साथ पुरानी ज्वाला लौटी। वे पर्वत से विशाल हुए, गुरुजनों और राम-स्मरण को प्रणाम कर छलांग हेतु सज्ज हुए। तट काँपा; आकाश खुलता सा लगा। भक्त इस क्षण को प्रेम करते हैं क्योंकि यह कहता है: शक्ति प्रतीक्षा कर सकती है, पर मिटती नहीं।
हृदय में राम नाम लेकर हनुमान उछले। बादल बिखरे; नीचे लहरें गर्जीं। बीच मार्ग में नागमाता सुरसा दिव्य आदेश से परीक्षा हेतु उठीं। उन्होंने निगलने का प्रण लिया; उन्होंने राम-कार्य का मार्ग माँगा। जब उन्होंने मुख फैलाया, वे और बढ़े; जब और चौड़ा किया, वे अँगूठे भर सिकुड़कर क्षण में प्रवेश-निर्गमन कर गए — उनके वचन का मान रखते हुए अपने व्रत को नहीं छोड़ते। चतुरता धर्म के सामने झुकी।
नीचे की छाया
जल में एक और संकट था — यात्रियों की छाया पकड़ने वाली राक्षसी। उसने लहरों पर उनकी छाया पकड़कर नीचे खींचने का यत्न किया। हनुमान ने छल पहचाना, शक्ति से प्रहार कर आगे बढ़े। यह प्रसंग साधक को सावधान करता है: नीचे से हर खिंचाव नियति नहीं; कुछ भय पर पलने वाले विचलन हैं। छलांग लंका की ओर रखो — राम द्वारा दिए कार्य की ओर।
अंततः स्वर्ण नगरी दिखाई दी। हनुमान उतरे, रूप छोटा कर तूफान नहीं — अन्वेषक बनकर प्रवेश किया। समुद्र पार पूर्ण हुआ, पर बड़ा कार्य — सीता को पाना और आशा पहुँचाना — अभी आरंभ ही था। मंदिरों और घरों में जब लोग हनुमान की छलांग कहते हैं, वे इसी पूरी गति की बात करते हैं: उठो, स्मरण करो, पार करो, और सेवा करो।
तट की प्रार्थना
जब अपना सागर अपार लगे — ऋण, रोग, टूटा संकल्प — एक क्षण वानरों की तरह बैठो, फिर उस नाम को पुकारो जिसने हनुमान को जगाया। साहस लहरों का अभाव नहीं; भय से बड़े उद्देश्य हेतु कूदने का निर्णय है। जय हनुमान। जय श्री राम।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- मूल प्रकरण के पद कहाँ पढ़ूँ?
- इस साइट पर रामचरितमानस के सुंदरकाण्ड प्रकरण देखें — मंगलाचरण और सुरसा-समुद्र पार कथा से आरंभ करें।
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