krishna · bhajan
नंदभवन में उड़ रही धूल — ब्रज रज भजन
ब्रज गीत जो नंद भवन की धूल को तीन लोक के तीर्थों से अधिक प्रिय मानता है — जन्माष्टमी और संध्या कीर्तन में गाया जाता है।

बैठकर गाएँ। शरीर के प्रत्येक अंग के बाद टेक पर लौटें, ताकि धूल सूची न बने — एक ही चित्र रहे।
जन्माष्टमी की अर्धरात्रि ही मंच पर्याप्त है। पालना आरती के बाद यह भजन ब्रज को माथे की रज बनाता है। दीप जलता हो तो कृष्ण आरती से समाप्त करें।
भजन के बोल
नंदभवन में उड़ रही धूल, धूल मोहे प्यारी लगे
उड़ उड़ धूल मेरे माथे पे आवे, मैंने तिलक लगाए भरपूर
उड़ उड़ धूल मेरे नैनन पे आवे, मैंने दर्शन करे भरपूर
उड़ उड़ धूल मेरे होठों पे आवे, मैंने भजन गाए भरपूर
उड़ उड़ धूल मेरे हाथन पे आवे, मैंने ताली बजाई भरपूर
तीन लोक तीरथ नहीं, जैसी ब्रज की धूल
लिपटी देखी अंग सो, भाग जाए यमदूत
मुक्ति कहे गोपाल सो, मेरी मुक्ति बताए
ब्रजरज उड़ माथे लगे, मुक्ति भी मुक्त हो जाए
उड़ उड़ धूल मेरे पैरन पे आवे, मैंने परिक्रमा लगाई भरपूर
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या यह केवल जन्माष्टमी का भजन है?
- जन्माष्टमी इसका पर्व-घर है। किसी भी गुरुवार कृष्ण बैठक या गीता पाठ की संध्या पर भी गा सकते हैं।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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