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गणेश चतुर्थी व्रत कथा — पार्वती के इक्कीस दिन
शिव ने चतुर्थी व्रत कैसे सिखाया, और पार्वती ने दूर्वा-पुष्प-लड्डू के इक्कीस दिन कैसे रखे जब तक कार्तिकेय लौटे।

गणेश की वार्षिक स्थापना जन्म-पर्व है। यह कथा पुराना व्रत-आख्यान है: माता प्रथम-पूज्य पुत्र से घर का मार्ग साफ करने को कहती है।
शिव ने देवों को सिखाया कि गणेश बिना कोई कार्य सुंदर नहीं खुलता, तब पार्वती को चतुर्थी व्रत कहा: आसन स्वच्छ, दूर्वा और मिष्ट अर्पण, वाणी निर्दय न हो, गजानन को विघ्नहर्ता स्मरण करें।
सुनकर पार्वती को कार्तिकेय की याद आई, जो अपनी यात्रा पर थे। उसने इक्कीस दिन व्रत बैठा — पुष्प, लड्डू, और सौदा न करने वाला मन। इक्कीसवें दिन स्कंद द्वार पर थे। तभी से चतुर्थी व्रत वह व्रत कहा जाता है जो कर्तव्य ने बिखेरा उसे लौटाता है।
स्थापना पर कथा क्यों
परिवार यह इसलिए पढ़ते हैं कि मिट्टी का अतिथि केवल सजा न रहे। विसर्जन तक बैठने, आरंभ मीठा करने, और झगड़े में काम न खोलने को कहा जाए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या यह मोदक-प्रदक्षिणा कथा है?
- नहीं। मोदक कथा माता-पिता की प्रदक्षिणा के ज्ञान की है। यह कथा पार्वती का चतुर्थी व्रत है। दोनों एक पर्व में कही जा सकती हैं।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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