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नवरात्रि कथा — माँ और महिषासुर
शरद नवरात्रि की कथा: दुर्गा की नौ रात्रियाँ, महिषासुर वध, और प्रत्येक संध्या माँ के एक स्वरूप का स्मरण क्यों होता है।

जब महिषासुर को नर या देव अकेले न मार सके, सब देवों की शक्ति दुर्गा बनीं। नौ रात्रि युद्ध घूमा; विजया पर महिष-अहंकार गिरा।
मार्कण्डेय के देवी माहात्म्य में देव, स्वर्ग से वंचित, अपना तेज एक रूप में उंडेलते हैं — सिंहारूढ़ नारी, प्रत्येक आयुध लिए। उसने भय से अनुमति नहीं माँगी। केवल इतना क्षेत्र माँगा जहाँ धर्म खड़ा हो सके।
नौ रात्रि, नौ मुख
गृहस्मृति रात्रियों के नाम रखती है: शैलपुत्री की निश्चलता, ब्रह्मचारिणी की तपस्या, चंद्रघंटा की घंटी, कूष्मांडा का अंतःसूर्य, स्कंदमाता की गोद, कात्यायनी का संकल्प, कालीरात्रि की अंधेरी करुणा, महागौरी का स्वच्छ प्रकाश, सिद्धिदात्री की पूर्णता। नाम मानचित्र हैं, प्रतियोगिता नहीं।
महिष बचने को रूप बदलता — महिष, नर, छल। दुर्गा का शूल रूप के पीछे नहीं भागा; क्रूरता समाप्त की। असुर गिरे, लोकों ने श्वास ली। इसलिए नवरात्रि विजया दशमी पर समाप्त होती है: शत्रु पर शोर नहीं, माँ के लंबे रात्रि-कर्म के बाद की शांति।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या घटस्थापना बिना यह कथा पर्याप्त है?
- कलश पारंपरिक आरंभ है। देर से जुड़ें तो दीप जलाएँ, कथा सुनें, शेष रात्रियाँ रखें।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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