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हनुमान जी ने वानर अवतार क्यों लिया
जयंती कथा: पवनपुत्र का वानर रूप सेवा की आकृति — सिंहासन रहित बल, वेश रहित भक्ति।

हनुमान जयंती पर घर केवल जन्म नहीं पूछते, यह भी पूछते हैं कि सबसे बड़ा भक्त वानर मुख क्यों धरे। उत्तर सेवा का दर्शन है।
जब विष्णु ने रामायण का क्षेत्र सजाया, देव वन-जन्म लिए ताकि स्वर्ग दूर सिंहासन से लंका न लड़े। वायु का अंश हनुमान बना — अंजना-मानस, उस सेना-सा मुख जो सेतु बाँधेगी। वानर रूप गरिमा से गिरना नहीं। वह गरिमा है जो कूद सके, उठा सके, और फिर भी झुक सके।
राम को एक और राजकुमार नहीं चाहिए था। ऐसा सेवक चाहिए था जो नायक बने बिना सागर पार करे। लंका जलाती पूँछ और पर्वत उठाते हाथ एक ही विनम्रता हैं: वह बल जो अपनी ओर नहीं दिखाता। इसलिए जयंती का सिंदूर उस देह का स्मरण है जिसने मुकुट के बदले धूल और भक्ति चुनी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- क्या यह जन्म-कथा से भिन्न है?
- हाँ। जन्म-कथा अंजना और वायु की है। यह कथा रूप वानर क्यों है — ताकि सेवा जगत के वन में चल सके।
आज का पंचांग
इस पाठ के लिए तिथि, मुहूर्त और आज के पर्व।
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